अमावस की रात में इक
चाँद की सी रौशनी का एहसास है ,
जेठ की इस बेरुखी में
सावन की भीनी सी खुशबु का एहसास है ,
यौवन की मचलती बयार
में बचपन की इठलाती फुहार का एहसास है ,
नाउम्मीदियों की तंग
गलियों में उम्मीद की आस का एहसास है ,
बेमानी की राह पर इमानियत
की बावलियों का एहसास है ,
संसार के बोझ तले दबे
कन्धों से इतर मस्ती और जिन्दादिली का एहसास है ,
असहाय की आखों में
रुके हुए अश्रुओं में जीवन की लालसा का एहसास है ,
समाज के झुठलाते रिश्तों
के बीच, रिश्तों के अजीब से बंधन का एहसास है ,
निखिल श्रीवास्तव 'संयम'
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